पहली लाश
रात के सन्नाटे में नवापुर शहर और भी ज़्यादा खामोश लग रहा था। सड़कें वही थीं, लाइटें वही थीं, लेकिन अब आर्यन वर्मा की नज़र से यह शहर बदल चुका था।
अब यह सिर्फ एक शहर नहीं था—यह एक अपराध स्थल था।
एपिसोड 1 की लाश अब “हार्ट अटैक” बन चुकी थी, लेकिन आर्यन के दिमाग़ में वह आदमी अब भी मरा नहीं था। उसकी आँखें, उसका डर, और उसके चेहरे पर जमी हुई वह चीख—सब कुछ बार-बार सामने आ रहा था।
सुबह की खबर
अगली सुबह अख़बार की हेडलाइन थी:
“रेलवे कॉलोनी में मिली लाश, पुलिस ने बताया प्राकृतिक मौत”
आर्यन ने अख़बार मोड़कर फेंक दिया।
“प्राकृतिक मौत नहीं थी ये,” उसने खुद से कहा,
“ये पहली लाश थी… और शायद आख़िरी नहीं।”
नील की फोटो
ऑफिस पहुँचते ही नील ने लैपटॉप खोला।
“ये देख,” नील बोला।
स्क्रीन पर लाश की क्लोज-अप तस्वीर थी। गले पर हल्का सा निशान।
“ये निशान…” आर्यन ने ध्यान से देखा।
“फांसी नहीं है,” नील बोला,
“और हार्ट अटैक में ऐसा नहीं होता।”
आर्यन चुप हो गया।
अब शक नहीं, यक़ीन हो चुका था।
लाश की पहचान
आर्यन ने अपनी पहचान का इस्तेमाल करके नगर निगम से जानकारी निकलवाई।
मृतक का नाम था रमेश यादव।
पेशा: रेलवे कॉन्ट्रैक्ट वर्कर।
पता: रेलवे कॉलोनी, ब्लॉक-C।
आर्यन को एक और चौंकाने वाली बात पता चली—
रमेश ने दो हफ्ते पहले RTI डाली थी।
विषय: रेलवे ज़मीन घोटाला।
आर्यन की आँखें सख्त हो गईं।
“तो यही वजह थी।”
रमेश का घर
रमेश का घर छोटा था। दरवाज़ा खुला मिला।
अंदर उसकी पत्नी सविता बैठी थी। आँखें सूजी हुई, चेहरा सूखा।
“आप पत्रकार हैं?” उसने धीरे से पूछा।
आर्यन ने सिर हिलाया।
“उन्होंने कहा था… अगर उन्होंने कुछ बताया तो…”
उसकी आवाज़ टूट गई।
“किसने कहा?” आर्यन ने पूछा।
सविता ने चारों ओर देखा, फिर फुसफुसाई,
“वो लोग… जो वर्दी में नहीं होते, लेकिन पुलिस से भी ज़्यादा ताकत रखते हैं।”
धमकी
सविता ने आर्यन को रमेश का मोबाइल दिया।
“मरने से एक दिन पहले उसने मुझे ये दिया था।”
मोबाइल में एक ऑडियो रिकॉर्डिंग थी।
आवाज़ भारी थी:
“अगर फाइल खोली… तो लाश उठानी पड़ेगी।”
रिकॉर्डिंग खत्म होते ही सन्नाटा छा गया।
आर्यन समझ गया—
यह हत्या प्लान की गई थी।
पुलिस की चुप्पी
आर्यन दोबारा इंस्पेक्टर विक्रम से मिला।
“रमेश यादव की RTI आपने देखी?” आर्यन ने पूछा।
विक्रम ने फाइल बंद कर दी।
“आर्यन, कुछ बातें बेहतर है दबी रहें।”
“किसके लिए बेहतर?”
आर्यन की आवाज़ तेज़ हो गई।
विक्रम ने सीधे उसकी आँखों में देखा।
“तुम्हारे लिए।”
यह चेतावनी अब साफ थी।
पहली लाश… या पहली चूक?
रात को आर्यन ने पुराने मामलों की लिस्ट बनाई।
पिछले पाँच साल में—
7 “प्राकृतिक मौतें”
3 “आत्महत्याएं”
सभी एक ही इलाके के आसपास।
और हर केस से पहले—
या तो RTI
या शिकायत
या गवाही
“ये पहली लाश नहीं है,” आर्यन बुदबुदाया,
“ये पहली पकड़ी गई लाश है।”
एक अनजान मदद
अचानक दरवाज़े पर दस्तक हुई।
आर्यन चौंक गया।
बाहर एक युवक खड़ा था—
पुलिस कॉन्स्टेबल अमन।
“मैं ज़्यादा देर नहीं रुक सकता,” अमन बोला।
उसने एक पेन-ड्राइव दी।
“ये सीसीटीवी फुटेज है… रेलवे कॉलोनी की।”
“तुम ये मुझे क्यों दे रहे हो?” आर्यन ने पूछा।
अमन की आवाज़ काँप गई।
“क्योंकि अगली लाश… मेरी भी हो सकती है।”
सीसीटीवी फुटेज
नील ने फुटेज चलाया।
रात 1:32 बजे…
एक गाड़ी आती है…
नंबर प्लेट कवर की हुई।
तीन आदमी उतरते हैं।
चेहरे नहीं दिखते।
रमेश को ज़बरदस्ती गाड़ी में बैठाया जाता है।
फुटेज ब्लैक हो जाती है।
आर्यन की मुट्ठियाँ भींच गईं।
“अब ये केस ‘हार्ट अटैक’ नहीं रह गया।”
एपिसोड का अंत
उसी रात टीवी न्यूज़ पर ब्रेकिंग चली—
“रेलवे कॉलोनी केस पूरी तरह सुलझा, पुलिस ने कहा—कोई साज़िश नहीं”
आर्यन टीवी बंद करता है।
डायरी में लिखता है:
“पहली लाश ने शहर की नींव हिला दी है।
लेकिन शहर अभी भी चुप है।
अगर मैं रुका…
तो अगली खबर मेरी होगी।”
कैमरा धीरे-धीरे उस पेन-ड्राइव पर ज़ूम करता है।
स्क्रीन ब्लैक।
सस्पेंस और गहरा हो जाता है…
