भूतिया हवेली Season 1 • Episode 1

हवेली में कदम


शाम का समय था। आसमान पर काले बादल ऐसे फैल चुके थे जैसे किसी ने पूरा शहर अपने साये में ढक लिया हो। हल्की-हल्की हवा चल रही थी, लेकिन उस हवा में ठंडक नहीं… बल्कि एक अजीब सी बेचैनी थी। शहर के बाहरी इलाके में एक पुरानी सड़क थी, जो सीधे जंगल के किनारे से गुजरती थी। उसी सड़क के अंत में एक हवेली थी—पुरानी, टूटती हुई, और वर्षों से बंद पड़ी। लोग उसे “भूतिया हवेली” कहते थे।

उस हवेली के बारे में शहर में कई कहानियाँ थीं। कोई कहता वहाँ रात में औरत के रोने की आवाज़ आती है। कोई कहता वहाँ आधी रात को दरवाज़े खुद-ब-खुद खुलते हैं। और कोई… कोई तो यह भी कहता था कि हवेली के अंदर जाने वाला इंसान कभी वापस नहीं आता। लेकिन यह सब बातें अक्सर लोग डर फैलाने के लिए कहते हैं—ऐसा ही सज्जाद भी मानता था।

सज्जाद एक तेज़ दिमाग वाला, साहसी और थोड़ा जिद्दी लड़का था। वो उन लोगों में से था जो हर चीज़ को तर्क से देखते हैं। उसे भूत-प्रेत की बातों पर भरोसा नहीं था। उसके लिए ये सब सिर्फ अफवाहें थीं। वहीं रेहाना… रेहाना सज्जाद से बिल्कुल अलग थी। वो समझदार थी, लेकिन उसके दिल में एक अजीब सा डर हमेशा रहता था। वो उन संकेतों पर विश्वास करती थी जो अक्सर दूसरों को दिखाई नहीं देते।

आज दोनों एक साथ उसी हवेली के सामने खड़े थे।

“सज्जाद… मुझे ये जगह सही नहीं लग रही,” रेहाना ने धीमे स्वर में कहा।

सज्जाद ने मुस्कुराकर कहा, “रेहाना, तुम भी ना… ये सिर्फ एक पुरानी इमारत है। लोग डर के कारण इसे भूतिया कहते हैं। हम बस अंदर जाएंगे, कुछ तस्वीरें लेंगे, और वापस आ जाएंगे।”

रेहाना ने हवेली की तरफ देखा। हवेली का मुख्य दरवाज़ा आधा खुला था, जैसे किसी ने जानबूझकर उसे खुला छोड़ा हो। अंदर से अंधेरा ऐसा था कि जैसे प्रकाश भी वहाँ जाने से डरता हो। हवेली की खिड़कियाँ टूट चुकी थीं, और दीवारों पर काली सी परत जमी हुई थी। चारों तरफ झाड़ियाँ थीं, जिनमें से अजीब सी सरसराहट की आवाज़ आ रही थी।

“दरवाज़ा… खुला क्यों है?” रेहाना ने घबराकर पूछा।

सज्जाद ने कहा, “शायद कोई जानवर अंदर चला गया होगा। या फिर हवा के कारण खुल गया होगा।”

रेहाना ने अपना बैग कसकर पकड़ लिया। “और अगर… कोई और हो?”

सज्जाद ने हंसकर कहा, “कोई भूत? चलो, आज देख ही लेते हैं।”

सज्जाद ने अपना मोबाइल फ्लैशलाइट ऑन किया और धीरे-धीरे हवेली के अंदर कदम रखा। रेहाना ने एक पल रुककर गहरी सांस ली और फिर उसके पीछे चल पड़ी।


हवेली के अंदर कदम रखते ही वातावरण बदल गया। बाहर की हवा भले ठंडी थी, लेकिन अंदर हवा और भी ठंडी थी—इतनी ठंडी कि रेहाना की सांस से भाप निकलने लगी। दीवारों से सीलन की बदबू आ रही थी। फर्श पर धूल की मोटी परत थी और हर कदम पर “चूं-चूं” जैसी आवाज़ होती थी।

सज्जाद ने चारों तरफ रोशनी घुमाई। सामने एक बड़ा हॉल था। हॉल में पुराने फर्नीचर पड़े थे—टूटी कुर्सियाँ, एक जंग लगा झूमर, और एक विशाल आईना जो आधा टूट चुका था। उस आईने के सामने खड़े होकर रेहाना को लगा जैसे किसी ने उसके पीछे से गुजरकर उसे देखा हो।

“सज्जाद…” रेहाना की आवाज़ कांप गई, “क्या तुमने कुछ महसूस किया?”

“क्या?” सज्जाद ने पूछा।

“जैसे… कोई हमारे साथ है।”

सज्जाद ने मजाक में कहा, “हाँ, हवेली का मालिक। शायद चाय देने आ रहा होगा।”

रेहाना ने उसे घूरा। “तुम मजाक मत करो।”

सज्जाद ने गंभीर होकर कहा, “ठीक है। चलो आगे देखते हैं।”


वे दोनों हॉल से आगे बढ़े। एक लंबा कॉरिडोर था, जिसके दोनों तरफ कमरे थे। हर कमरे का दरवाज़ा बंद था, लेकिन कुछ दरवाज़े आधे खुले भी थे। कॉरिडोर की छत पर मकड़ी के जाले थे। जैसे-जैसे वे आगे बढ़ रहे थे, रेहाना का डर बढ़ता जा रहा था।

तभी अचानक—

ठक… ठक… ठक…

किसी कमरे के अंदर से दरवाज़े पर दस्तक जैसी आवाज़ आई।

रेहाना चौंककर पीछे हट गई। “सज्जाद! ये आवाज़…!”

सज्जाद भी एक पल के लिए रुक गया। उसकी आंखें कमरे की तरफ गईं। दरवाज़ा बंद था, लेकिन दरवाज़े के नीचे से हल्की-सी हवा बाहर आ रही थी।

“ये… हवा का असर होगा,” सज्जाद ने खुद को संभालते हुए कहा।

रेहाना ने कहा, “नहीं, ये हवा नहीं थी। ये किसी ने… अंदर से खटखटाया!”

सज्जाद ने दरवाज़े के पास जाकर जोर से कहा, “कौन है अंदर?”

अंदर से कोई जवाब नहीं आया।

फिर अचानक—

धड़ाम!

कॉरिडोर के आखिरी हिस्से में कोई चीज़ गिरने की आवाज़ आई। दोनों एक साथ उधर देखने लगे। वहाँ अंधेरा था, और उस अंधेरे में किसी परछाई का अहसास हुआ।

रेहाना ने डरते हुए कहा, “चलो… वापस चलें।”

लेकिन सज्जाद का अहंकार जाग चुका था। “नहीं, अब तो मैं देखूंगा।”


सज्जाद धीरे-धीरे आगे बढ़ा। रेहाना पीछे-पीछे चल रही थी, लेकिन उसका शरीर काँप रहा था। कॉरिडोर के अंत में एक सीढ़ी थी जो ऊपर की मंज़िल पर जाती थी। सीढ़ियों के पास एक पुरानी लकड़ी की अलमारी थी। वही अलमारी गिरने की आवाज़ आई थी।

सज्जाद ने फ्लैशलाइट से अलमारी को देखा। अलमारी का एक दरवाज़ा खुला हुआ था। अंदर पुराने कपड़े और कुछ टूटे हुए खिलौने पड़े थे। लेकिन जो चीज़ सबसे अजीब थी, वो था एक गुड़िया

गुड़िया की आँखें लाल रंग से रंगी हुई थीं। उसका चेहरा आधा जला हुआ था। और सबसे डरावनी बात… वो गुड़िया अलमारी में नहीं थी, बल्कि अलमारी के सामने फर्श पर बैठी थी।

रेहाना ने चीखते हुए कहा, “ये… ये यहाँ कैसे आई?!”

सज्जाद ने कहा, “शायद गिर गई होगी।”

रेहाना ने गुस्से और डर में कहा, “सज्जाद! वो गुड़िया पहले अंदर थी! अब बाहर है!”

सज्जाद कुछ बोल नहीं पाया। उसने गुड़िया को उठाने की कोशिश की, लेकिन जैसे ही उसने गुड़िया को छुआ—

झनझन… झनझन…

हवेली के अंदर झूमर अपने आप हिलने लगा।

फिर—

हूं… हू… हू…

एक धीमी-सी आवाज़ गूंजने लगी। जैसे कोई औरत रो रही हो।

रेहाना ने अपने कान बंद कर लिए। “ये… ये क्या है?”

सज्जाद का चेहरा भी अब बदल चुका था। उसके अंदर भी डर घुसने लगा था, लेकिन वो उसे स्वीकार नहीं करना चाहता था।

“ये… ये बस हवा का दबाव होगा,” उसने कहा, लेकिन उसकी आवाज़ में खुद भरोसा नहीं था।


रेहाना ने कांपते हुए कहा, “सज्जाद… मुझे लगता है हमें निकल जाना चाहिए।”

सज्जाद ने सिर हिलाया। “ठीक है। चलो।”

वे दोनों तेजी से वापस मुड़े, लेकिन तभी—

धड़ाम!

हवेली का मुख्य दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया।

रेहाना की सांस रुक गई। “दरवाज़ा… बंद हो गया!”

सज्जाद भागकर दरवाज़े के पास गया और जोर से धक्का दिया। लेकिन दरवाज़ा नहीं खुला। उसने हैंडल घुमाया। लॉक नहीं था, फिर भी दरवाज़ा जैसे किसी ने पकड़ रखा था।

“ये… ये कैसे?” सज्जाद बुदबुदाया।

रेहाना रोते हुए बोली, “मैंने कहा था ना… ये जगह ठीक नहीं है…”

सज्जाद ने गुस्से में कहा, “कोई ना कोई रास्ता होगा। खिड़की से निकलते हैं।”


वे दोनों हॉल की तरफ भागे। एक खिड़की टूटी हुई थी। सज्जाद ने खिड़की से बाहर झाँका, लेकिन बाहर घना अंधेरा था और बारिश शुरू हो चुकी थी। बिजली चमकी, और उसी बिजली की रोशनी में सज्जाद ने देखा—

हवेली के बाहर, बरामदे में…

एक औरत खड़ी थी।

सफेद साड़ी में।

बाल खुले हुए।

चेहरा झुका हुआ।

और उसके पैर… जमीन पर नहीं थे।

सज्जाद का शरीर सुन्न हो गया।

रेहाना ने पूछा, “क्या हुआ?”

सज्जाद ने धीरे से कहा, “रेहाना… पीछे हटो…”

रेहाना ने खिड़की से देखा और उसकी चीख निकल गई।

“या अल्लाह…!”


वो औरत धीरे-धीरे हवेली की तरफ बढ़ रही थी। उसके कदमों की आवाज़ नहीं थी, लेकिन उसके आने से हवेली की हवा और ठंडी हो गई। रेहाना ने सज्जाद का हाथ पकड़ लिया।

“सज्जाद… हम फंस गए हैं…”

सज्जाद ने पहली बार अपनी जिंदगी में महसूस किया कि कुछ चीज़ें तर्क से बाहर होती हैं। उसने कांपते हुए कहा, “ये… ये सच है…”

तभी—

हवेली के अंदर किसी ने फुसफुसाकर कहा—

“सज्जाद…”

सज्जाद ने पीछे देखा।

हॉल के बीचोंबीच वही गुड़िया खड़ी थी।
लेकिन अब वो बैठी नहीं थी।

वो खड़ी थी।

और उसकी आंखें… अब सच में चमक रही थीं।

रेहाना ने चीखकर कहा, “भागो!!!”


दोनों ऊपर की सीढ़ियों की तरफ भागे, क्योंकि नीचे कोई रास्ता नहीं था। सीढ़ियाँ चरमराने लगीं। जैसे हवेली खुद जाग चुकी हो।

ऊपर पहुंचकर उन्हें एक कमरा दिखा, जिसका दरवाज़ा खुला था। दोनों अंदर घुसे और दरवाज़ा बंद कर लिया।

कमरे के अंदर एक पुराना पलंग था। दीवारों पर पुराने फोटो लगे थे। और एक फोटो ऐसा था, जिसे देखकर रेहाना की आंखें फैल गईं।

उस फोटो में—

वही सफेद साड़ी वाली औरत थी।
और उसके साथ… एक आदमी।

और वो आदमी…

सज्जाद जैसा दिखता था।

रेहाना ने कांपते हुए कहा, “सज्जाद… ये… ये तुम्हारा चेहरा…”

सज्जाद की सांस तेज़ हो गई। उसने फोटो को ध्यान से देखा।

“ये… ये मैं नहीं हूँ…”

लेकिन फोटो में चेहरा बिल्कुल उसी जैसा था।

तभी कमरे की दीवार पर खून से लिखा हुआ एक वाक्य चमकने लगा।

धीरे-धीरे।

जैसे किसी अदृश्य हाथ ने लिखा हो—

“तुम वापस आ गए हो…”

रेहाना रोने लगी।

और (Episode 1 के आखिरी सेकंड में) दरवाज़े के बाहर से वही औरत की आवाज़ आई—

“इस बार… तुम बच नहीं पाओगे…”


Episode 1 समाप्त

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