गुमशुदा
नवापुर की सुबह आज कुछ ज़्यादा ही ठंडी थी। आसमान साफ़ था, लेकिन हवा में बेचैनी घुली हुई थी।
आरव वर्मा ने अपनी घड़ी देखी—सुबह के नौ बज चुके थे।
मीरा का फोन अब भी स्विच ऑफ़ था।
खामोशी का पहला झटका
“वो कभी बिना बताए नहीं जाती,”
आरव ने खुद से कहा।
उसने मीरा के घर की घंटी कई बार बजाई।
कोई जवाब नहीं।
दरवाज़ा आधा खुला था।
आरव का दिल ज़ोर से धड़क उठा।
खाली घर
घर के अंदर अजीब सी शांति थी।
सोफ़ा वैसा ही था।
किचन में आधी बनी चाय ठंडी पड़ी थी।
मीरा का बैग…
मोबाइल…
सब गायब।
लेकिन सबसे डरावनी चीज़—
दरवाज़े के पास खून की एक बूंद।
आरव का डर
आरव घुटनों के बल बैठ गया।
उसके हाथ कांप रहे थे।
“मीरा…”
उसकी आवाज़ भर्रा गई।
उसे याद आया—
पिछली रात की धमकी।
अजनबी साया।
नकाबपोश लोग।
सब कुछ जुड़ने लगा।
पुलिस की औपचारिकता
इंस्पेक्टर विक्रम मौके पर पहुँचा।
“लड़की खुद भी जा सकती है,”
उसने लापरवाही से कहा।
आरव भड़क उठा।
“आप मज़ाक कर रहे हैं?
यह अपहरण है!”
विक्रम ने ठंडी मुस्कान दी।
“हम जांच करेंगे।”
आरव समझ गया—
पुलिस समय बर्बाद करेगी।
एक छुपा हुआ सुराग
नील घर की तस्वीरें ले रहा था।
“आरव… ये देख,”
उसने दीवार की ओर इशारा किया।
वहाँ पेंसिल से लिखा था—
C-17
आरव की आँखें फैल गईं।
“रेलवे कॉलोनी… ब्लॉक C-17,”
उसने फुसफुसाया।
दौड़ शुरू होती है
आरव बिना समय गंवाए निकल पड़ा।
रेलवे कॉलोनी वही जगह थी—
जहाँ से यह सब शुरू हुआ था।
ब्लॉक C-17 के पास एक पुराना गोदाम था।
जंग लगा दरवाज़ा।
सन्नाटा।
गोदाम का डर
दरवाज़ा अंदर से बंद था।
आरव ने ज़ोर लगाया।
अंदर अंधेरा था।
एक हल्की आवाज़ आई—
किसी के रोने की।
“मीरा?”
आरव चिल्लाया।
कोई जवाब नहीं।
खाली कुर्सी
अंदर एक कुर्सी पड़ी थी।
रस्सी के निशान।
फ़र्श पर घसीटे जाने के चिन्ह।
आरव की सांसें तेज़ हो गईं।
“वो यहाँ थी…”
उसने दांत भींचे।
लेकिन अब नहीं थी।
फोन कॉल
तभी आरव का फोन बजा।
अनजान नंबर।
“अगर लड़की ज़िंदा चाहिए…”
भारी आवाज़ बोली,
“तो आज रात 12 बजे…
पुराने पुल पर आना।”
“अकेले,”
आवाज़ ने जोड़ा।
कॉल कट।
समय का दबाव
घड़ी की सुइयाँ जैसे दौड़ रही थीं।
आरव ने नील को देखा।
“अगर मैं नहीं लौटा…”
नील ने उसे रोका।
“तू अकेला नहीं जाएगा।”
आरव ने सिर हिलाया।
“ये मेरी लड़ाई है।”
पुराना पुल
रात के ठीक बारह बजे।
पुराना पुल सुनसान था।
नीचे काला पानी बह रहा था।
एक गाड़ी आई।
दरवाज़ा खुला।
मीरा को बाहर लाया गया—
हाथ बंधे हुए।
उसकी आँखों में डर था,
लेकिन वह आरव को देखते ही रो पड़ी।
सच का सौदा
“फाइल बंद कर दो,”
आदमी बोला।
“और लड़की घर चली जाएगी।”
आरव की आँखें लाल हो गईं।
“और अगर नहीं?”
उसने पूछा।
आदमी मुस्कुराया।
“तो लाश नदी में मिलेगी।”
आरव का फैसला
आरव ने एक कदम आगे बढ़ाया।
“अगर तुमने उसे कुछ किया…”
उसकी आवाज़ में ज़हर था,
“तो यह शहर तुम्हारा नाम भी नहीं बचेगा।”
एक पल के लिए सन्नाटा छा गया।
फिर अचानक—
पुलिस सायरन।
अफरा-तफरी।
गोली चली।
अधूरा बचाव
मीरा ज़मीन पर गिर पड़ी।
आरव दौड़ा।
उसे उठाया।
खून नहीं था—
लेकिन वह बेहोश थी।
अपहरणकर्ता भाग चुके थे।
एपिसोड का अंत
अस्पताल के बाहर आरव बैठा था।
हाथों में मीरा का दुपट्टा।
डॉक्टर ने कहा,
“वो बच गई है…
लेकिन खतरा अभी टला नहीं।”
आरव ने आसमान की ओर देखा।
“अब यह सिर्फ एक केस नहीं रहा।
यह जंग है।”
कैमरा धीरे-धीरे अस्पताल के कॉरिडोर से बाहर जाता है।
एक परछाईं दूर खड़ी देख रही है।
खेल अभी खत्म नहीं हुआ।
